सारा संसार वृत्तियों का खेल है। अगर हम ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण (Self-observation) करें, तो आप चौंका जायेंगे । ज्यादातर मामलों में हम अपने जीवन को नहीं चला रहे हैं, बल्कि वृत्तियाँ हमें चला रही हैं। अगर कोई आपकी प्रशंसा करता है, तो आप मुस्कुराते हैं। अगर कोई अपमान करता है, तो आप दुखी या क्रोधित हो जाते हैं। यहाँ आप “स्वयं” कुछ नहीं कर रहे, बल्कि आपकी वृत्तियाँ बाहरी धक्के के हिसाब से प्रतिक्रिया दे रही हैं। जैसे पानी में पत्थर फेंकने पर लहर उठती है, वैसे ही संसार के धक्कों से आपके भीतर वृत्तियाँ उठती हैं और आप उनके पीछे चलने लगते हैं।
वृत्तियाँ हमें ‘इच्छा’ के माध्यम से नचाती हैं। मन में एक विचार (वृत्ति) उठता है कि “मुझे यह चीज़ चाहिए।” अब वह विचार आपको तब तक चैन से बैठने नहीं देगा जब तक आप उसे पूरा न कर लें। यहाँ चलाने वाला वह ‘विचार’ है, आप तो बस उसे पूरा करने के लिए दौड़ रहे हैं।
वैज्ञानिक शोध और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, एक सामान्य मनुष्य के मन में प्रतिदिन 60,000 से 80,000 विचार (वृत्तियाँ) पैदा होती हैं। लेकिन यह केवल संख्या नहीं है, इसके पीछे का गणित और मनोविज्ञान इसे और भी दिलचस्प बनाता है:
वृत्तियों का गणित
- प्रति मिनट: लगभग 40 से 50 विचार।
- प्रकार: शोध बताते हैं कि इनमें से लगभग 95% विचार दोहराव वाले (Repetitive) होते हैं—यानी जो कल सोचा था, वही आज भी सोच रहे हैं।
- प्रकृति: दुर्भाग्य से, औसत व्यक्ति के 80% विचार नकारात्मक या चिंताजनक होते हैं।
ये इतनी संख्या में क्यों पैदा होती हैं?
वृत्तियाँ केवल खाली विचार नहीं हैं, ये इन रास्तों से आती हैं:
- इंद्रियाँ: जो हम देखते, सुनते या चखते हैं, वह तुरंत एक वृत्ति पैदा करता है।
- संस्कार (Memory): हमारे अवचेतन मन में दबी पुरानी यादें बिना किसी बाहरी कारण के भी वृत्तियाँ पैदा करती रहती हैं।
- कल्पना: भविष्य की चिंता या योजनाएँ।
क्या हम इन सबको देख पाते हैं?
नहीं। इनमें से अधिकांश वृत्तियाँ ‘सूक्ष्म’ होती हैं और बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह चलती रहती हैं। हम केवल उन्हीं पर ध्यान दे पाते हैं जो बहुत गहरी होती हैं या जिनसे हमारी भावनाएं (डर, क्रोध, मोह) जुड़ी होती हैं।
एक रोचक तथ्य: योग शास्त्र के अनुसार, वृत्तियों की संख्या गिनना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनकी ‘दिशा’ महत्वपूर्ण है। क्या वे आपको “क्लेश” (दुख) की ओर ले जा रही हैं या “अक्लेश” (शांति) की ओर?
इसे सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:
1. वृत्तियाँ क्या हैं?
‘वृत्ति’ का अर्थ होता है—भँवर या लहर। जैसे शांत तालाब में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं, वैसे ही बाहरी दुनिया की चीजें जब हमारे मन से टकराती हैं, तो मन में विचार, भावना और प्रतिक्रिया की लहरें उठती हैं। इन्हीं को वृत्ति कहते हैं।
- प्रमाण: जो हम देखते-सुनते हैं।
- विपर्यय: गलतफहमी या भ्रम।
- विकल्प: कल्पनाएँ या ख्याली पुलाव।
- निद्रा: शून्य का अनुभव।
- स्मृति: पुरानी यादें।
2. संसार वृत्तियों का खेल कैसे है?
संसार वैसा नहीं है जैसा वह है, बल्कि वैसा है जैसा हम उसे देखते हैं। अगर आपकी वृत्ति खुश है, तो आपको पतझड़ में भी सुंदरता दिखेगी। अगर आपकी वृत्ति क्रोधित या दुखी है, तो सबसे अच्छा संगीत भी शोर लगेगा। यानी, बाहरी दुनिया सिर्फ एक ‘स्क्रीन’ है, असली फिल्म आपकी वृत्तियों के प्रोजेक्टर से चल रही है।
3. ये हमें कैसे नचाती हैं?
वृत्तियाँ हमें मुख्य रूप से तीन तरीकों से अपने इशारों पर नचाती हैं:
- राग और द्वेष (Like & Dislike): मन में किसी चीज के प्रति ‘पसंद’ (राग) पैदा होती है, तो हम उसके पीछे भागते हैं। ‘नापसंद’ (द्वेष) पैदा होती है, तो हम उससे दूर भागते हैं। हम पूरी जिंदगी बस इसी ‘भागने’ और ‘बचने’ के खेल में लगे रहते हैं।
- अभिनिवेश (Fear of Loss): वृत्तियाँ हमें डराती हैं कि जो हमारे पास है (जैसे पद, प्रतिष्ठा, शरीर), वह छिन न जाए। इस डर के कारण हम वह सब करते हैं जो हम नहीं करना चाहते।
- अस्मिता (Ego): वृत्तियाँ हमें एक ‘पहचान’ में बांध देती हैं। “मैं अमीर हूँ,” “मैं बेचारा हूँ,” “मैं सही हूँ।” एक बार जब मन में यह वृत्ति बैठ जाती है, तो हम अपनी ही बनाई हुई छवि (Image) को बचाने के लिए कठपुतली की तरह नाचते हैं।
4. इससे बाहर कैसे निकलें?
जब मन की लहरें शांत हो जाती हैं, तब हम वह देख पाते हैं जो हम वास्तव में हैं, न कि वह जो हमारी वृत्तियाँ हमें दिखा रही हैं।
इसका परीक्षण कैसे करें? अगली बार जब आपको बहुत तेज गुस्सा आए या किसी चीज़ की तीव्र इच्छा हो, तो बस 10 सेकंड के लिए रुक जाइए। अगर आप उस आवेग (Impulse) के बावजूद रुक पाते हैं और तय कर पाते हैं कि आपको क्या करना है, तो उस 10 सेकंड के लिए जीवन आपके हाथ में है। अगर आप रुक नहीं पाते और बह जाते हैं, तो समझ लीजिए कि वृत्ति आपको चला रही है।
निष्कर्ष: हम एक चलती हुई मशीन की तरह हैं जिसे लगता है कि वह अपनी मर्जी से चल रही है। होश का अर्थ ही है उस मशीन के मैकेनिज्म को समझना और अपना नियंत्रण वापस लेना।