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hamara man kya chahta hai

हमारा मन क्या चाहता है ?

Posted on February 8, 2026

मन के बारे में सबसे बड़ा रहस्य यह है कि मन वह नहीं चाहता जो वह माँगता है। ऊपर से लगता है कि मन को धन, पद, भोग या रिश्ते चाहिए, लेकिन इसके गहरे तल पर तीन बुनियादी चाहतें छिपी होती हैं:

1. मन चाहता है ‘उत्तेजना’ (Stimulation)

मन का स्वभाव एक बंदर की तरह है। वह एक क्षण भी खाली नहीं बैठ सकता। उसे ‘खालीपन’ से मौत जैसा डर लगता है।

  • इसलिए वह हर समय कुछ न कुछ बुनता रहता है। अगर सुख के विचार नहीं मिले, तो वह दुख के विचार पैदा करेगा। अगर शांति मिली, तो वह ऊब (Boredom) पैदा कर देगा ताकि आप फिर से अशांत होने के लिए कुछ काम शुरू कर दें।
  • सत्य: मन को ‘विषय’ चाहिए ताकि वह अपना अस्तित्व बचाए रख सके।

2. मन चाहता है ‘सुरक्षा और निरंतरता’

मन हमेशा डरा हुआ रहता है। उसे पता है कि सब कुछ बदल रहा है, लेकिन वह ‘स्थायित्व’ चाहता है।

  • वह चाहता है कि सुख हमेशा बना रहे और दुख कभी न आए। वह चाहता है कि जो लोग उसके हैं, वे कभी न बदलें।
  • संसार के ‘बदलाव’ के नियम और मन की ‘पकड़’ के बीच जो संघर्ष होता है, वही दुख बन जाता है।

3. मन चाहता है ‘बड़ा होना’ (Expansion of Ego)

मन की भूख अनंत है। वह जो भी पाता है, थोड़ी देर बाद वह उसे छोटा लगने लगता है।

  • आज अगर आप एक साइकिल चाहते हैं, तो मिलने के बाद मन दो दिन खुश रहेगा, तीसरे दिन वह कार चाहने लगेगा।
  • असल में मन ‘पूर्णता’ (Totality) चाहता है, लेकिन वह उसे ‘वस्तुओं’ में खोजता है। चूँकि वस्तुएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकतीं, इसलिए मन की प्यास कभी नहीं बुझती।

मन का असली स्वभाव: ‘भिखारी’ या ‘मालिक’?

ओशो कहते थे कि मन एक ऐसे भिखारी की तरह है जिसका कटोरा नीचे से टूटा हुआ है। आप उसमें कितना भी डाल दें, वह हमेशा खाली ही रहेगा।

मन की असली चाहत क्या है? गहराई में देखें तो मन ‘विश्राम’ (Rest) चाहता है। लेकिन विडंबना यह है कि वह विश्राम पाने के लिए और जोर से भागता है। उसे लगता है कि ‘वहाँ’ पहुँचकर मैं शांत हो जाऊँगा, लेकिन ‘भागना’ ही अशांति है।

इसे कैसे समझें?

मन एक मशीन है जिसका काम है—खोजना। लेकिन वह खुद को नहीं खोज सकता।

  • जब आप मन की बात मानकर उसके पीछे दौड़ते हैं, तो वह आपको थका देता है।
  • जब आप मन को एक उपकरण (Tool) की तरह इस्तेमाल करते हैं और उसके कहने पर नाचना बंद कर देते हैं, तब आपको उस शांति का अनुभव होता है जिसे मन खोज तो रहा था, पर कभी पा नहीं सकता था।

मन, वृत्तियाँ और अहंकार ये सब क्या हैं?

तकनीकी रूप से ये तीनों अलग-अलग हैं, लेकिन व्यवहार में ये एक ही ‘चेन’ या सिस्टम की तरह काम करते हैं। आप इन्हें एक ‘प्रोजेक्टर’ के उदाहरण से समझ सकते हैं:

1. मन (The Screen/Projector)

मन वह शक्ति या सतह है जिस पर सब कुछ घटित होता है। यह एक स्टोरहाउस है। इसमें आपकी यादें, इच्छाएं और डेटा जमा होता है। मन का अपना कोई आकार नहीं होता, यह बस विचारों का प्रवाह है।

2. वृत्तियाँ (The Film/Waves)

वृत्तियाँ वे लहरें या विचार हैं जो मन के ऊपर उठती हैं।

  • जैसे शांत तालाब (मन) में पत्थर फेंकने पर लहरें (वृत्तियाँ) उठती हैं।
  • वृत्तियाँ वे ‘फिल्में’ हैं जो मन के प्रोजेक्टर पर चलती हैं। बिना वृत्ति के मन खाली है, और बिना मन के वृत्ति उठ नहीं सकती।

3. अहंकार या अस्मिता (The Identification/Actor)

अहंकार वह ‘भाव’ है जो इन वृत्तियों के साथ चिपक जाता है।

  • वृत्ति उठी— “गुस्सा।”
  • अहंकार ने कहा— “मुझे गुस्सा आया है।” अहंकार वह ‘केंद्र’ है जो यह दावा करता है कि “यह विचार मेरा है।” यही वह ‘मैं’ (Ego) है जो वृत्तियों को अपना मानकर उनके पीछे नाचने लगता है।

इनके आपसी संबंध को इस तालिका से समझें:

तत्वउदाहरणकार्य
मनआकाशजहाँ बादल (विचार) आते-जाते हैं।
वृत्तियाँबादलजो कभी काले (दुखद) तो कभी सफेद (सुखद) होते हैं।
अहंकारस्वयं को बादलों का मालिक समझनायह मान लेना कि “मैं ही बादल हूँ।”

ये कैसे एक साथ मिलकर हमें फंसाते हैं?

  1. इंद्रियाँ बाहर से कोई जानकारी लाती हैं (जैसे किसी ने अपमान किया)।
  2. मन उस जानकारी को प्रोसेस करता है।
  3. वृत्ति पैदा होती है (बदले की भावना की लहर)।
  4. अहंकार तुरंत बीच में आता है और कहता है, “उसने मेरा अपमान किया, अब मैं उसे सबक सिखाऊंगा।”

क्या हम इनसे अलग हैं?

हाँ। योग दर्शन कहता है कि आप इन तीनों के ‘साक्षी’ (Witness) हैं।

  • आप मन नहीं हैं, क्योंकि आप मन को देख सकते हैं।
  • आप वृत्ति नहीं हैं, क्योंकि वृत्तियाँ बदलती रहती हैं (अभी खुशी, अभी दुख) लेकिन आप वही रहते हैं।
  • आप अहंकार भी नहीं हैं, क्योंकि गहरी नींद (Sushupti) में आपका अहंकार मिट जाता है, फिर भी आप सुबह उठकर कहते हैं कि “मैं मजे से सोया।”

निष्कर्ष: मन एक यंत्र है, वृत्ति उसकी कार्यप्रणाली है, और अहंकार उसका चालक (Driver) होने का भ्रम है। असली ‘आप’ वह हैं जो जागकर इस पूरे तमाशे को चुपचाप देख सकते हैं लेकिन मन चाहता है कि आप कभी ‘जागें’ नहीं, क्योंकि आपके जागते ही मन का खेल खत्म हो जाता है।

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