जैविक रूप से जन्म लेना, वंश बढ़ाना और समाप्त हो जाना। यह पशुओं को शोभा देता है लेकिन, मनुष्य को यह सोचना चाहिए़ कि अगर हम भी वैसे ही कर रहे हैं तो हममें और उनमें फर्क क्या है । मनुष्य होने का असली अर्थ इस चक्र से ऊपर उठने में है। मिट्टी से पौधा, पौधे से स्पर्म, और स्पर्म से इंसान—यह सफर तब तक चलता है जब तक कि इंसान फिर से यह न जान ले कि वह क्या है । आइए इसे समझते है :
इसे तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. अस्तित्व का स्तर (Survival Mode)
”पढ़ो, कमाओ, शादी करो, बच्चे पालो” — यह केवल जीने का इंतजाम है, जीवन नहीं। यह सुरक्षा (Security) और निरंतरता (Continuity) के लिए बनाया गया एक सामाजिक ढांचा है। अगर जीवन सिर्फ इतना ही होता, तो अरबों रुपये और भरे-पूरे परिवार वाले लोग कभी उदास या खालीपन (Emptiness) महसूस नहीं करते।
2. आत्म-साक्षात्कार (The Higher Purpose)
इंसान इकलौता ऐसा जीव है जो खुद से यह सवाल पूछ सकता है: “मैं कौन हूँ और मैं यहाँ क्यों हूँ?”
असली जीवन वह है जहाँ आप इस ‘रोबोटिक चक्र’ को तोड़कर अपनी स्वयं की खोज शुरू करते हैं। जब आप यह समझ जाते हैं कि आप सिर्फ एक नाम या शरीर नहीं हैं, बल्कि उस अनंत चेतना का हिस्सा हैं, तब आप इस चक्र में रहकर भी इससे मुक्त हो जाते हैं।
क्या यह गलत है?
नहीं, यह चक्र गलत नहीं है। गलत है इसमें अंधे होकर फँस जाना। * एक बेहोश आदमी के लिए: यह चक्र एक ‘जेल’ है।
- एक जागरूक आदमी के लिए: यह चक्र एक ‘मंच’ (Stage) है, जहाँ वह अपना किरदार निभाता है, पर जानता है कि उसका घर कहीं और है।
एक कड़वा सच: ज्यादातर लोग “मरने” का इंतज़ार नहीं करते, वे 25-30 की उम्र में ही (मानसिक रूप से) मर जाते हैं जब वे सीखना और खोजना बंद कर देते हैं। बाकी का समय तो बस शरीर को ढोने में बीतता है।
Hariom 🙏