दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो आदमी जीवन भर जिस मूल बीमारी का इलाज करने की कोशिश करता है, उसे ‘अपूर्णता’ (Incompleteness) कहते हैं।
वह हमेशा खुद को अधूरा महसूस करता है और उसे लगता है कि कुछ ‘बाहरी’ पाने से वह पूरा हो जाएगा। इसी अपूर्णता के कारण कई अन्य मानसिक बीमारियाँ जन्म लेती हैं जिनका इलाज वह ताउम्र करता रहता है:
1. “संग्रह” की बीमारी (The Disease of Accumulation)
आदमी को लगता है कि जितना ज्यादा धन, पद, और प्रतिष्ठा उसके पास होगी, वह उतना ही सुरक्षित और सुखी होगा। किसी के पास 1 लाख हैं, किसी के पास 1 करोड़, लेकिन बेचैनी दोनों में समान हो सकती है। वह जीवन भर ‘कमी’ का इलाज ‘जमा’ करने से करता है, पर प्यास कभी नहीं बुझती।
2. “भय” की बीमारी (The Disease of Fear)
यह सबसे गहरी बीमारी है। मौत का डर, अकेलेपन का डर, या कुछ खो जाने का डर। आदमी जीवन भर सुरक्षा (Security) के इंतजाम करता है—बीमा करवाता है, घर बनाता है, रिश्ते जोड़ता है। वह असल में अपनी नश्वरता (Mortality) का इलाज करने की कोशिश कर रहा होता है।
3. “विचारों” की बीमारी (Mental Noise)
आदमी सबसे ज्यादा परेशान अपने खुद के विचारों से है। वह शांति की तलाश में मंदिर, गुरु और हिमालय तक जाता है। वह जीवन भर अपने ‘अशांत मन’ का इलाज करता रहता है।
4. “अहंकार” की बीमारी (The Ego)
आदमी हमेशा खुद को ‘विशेष’ सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है। वह चाहता है कि लोग उसे जानें, उसकी सराहना करें। यह ‘मैं’ की जो बीमारी है, यही उसे परेशान करती है।
असली इलाज क्या है?
अध्यात्म कहता है कि आदमी गलत जगह इलाज ढूंढ रहा है। वह बाहर की चीजों (दवा, पैसा, रिश्ते) से भीतर के घाव भरना चाहता है ।
एक कबीर का दोहा है: “वस्तु कहीं ढूंढे कहीं, केहि विधि आवे हाथ।”
(चीज कहीं और है और तुम ढूंढ कहीं और रहे हो, तो वह हाथ कैसे आएगी?)