अहंकार (मैं) सब कुछ जानने की कोशिश करता है लेकिन कभी अपने बारे में बात नहीं करता है कि वह कौन है और कहाँ से आया है। वह अपनी मौत से बहुत डरता है। न तो उसे दिन में चैन है और नहीं रात में चैन है। अहंकार उस हिरण की तरह है जो रेगिस्तान में मृगतृष्णा (Mirage) के पीछे दौड़ते-दौड़ते दम तोड़ देता है। जब तक हम भाग रहे हैं, हमें सिर्फ हवा के झोंके महसूस होते हैं, जमीन नहीं।
शरीर हर क्षण बदल रहा है लेकिन हमें लगता है कि “मैं वही हूँ”? क्योंकि हम इस बारे में बिचार ही नहीं करते हैं, बस जी रहे हैं। हम नौकर को तो जो कहेंगे वो कर देगा लेकिन जिस शरीर को हम मैं मानकर जी रहे हैं। उसपर हमारा कितना अधिकार है। बहुत सीमित नियंत्रण है। फिर भी अहंकार बड़ा-बड़ा दावा ठोकता है। मैंने ये कर दिया मैंने वो कर दिया, न जाने क्या क्या। इसी में सारी जिंदगी चली जाती है। बचपन में जहाँ से चले थे वही पहुंच जाते हैं। खाली का खाली।
प्रकृति रोज डंडे मारती है कि अपनी दिशा बदल लेकिन नशे में चूर ये अहंकार कहता है। मै ही तो सब कर रहा हूँ। इस अहंकार ने सारे कर्म दुःख दूर करने के लिए किये लेकिन आज तक दुःख गया नहीं और सुख टिका नहीं। क्योंकि संसार एक बहाव की धारा है इसमें कुछ टिक नहीं सकता। अहंकार बचपन से बुढ़ापे तक सुख को टिकाने में लगा रहता है। अहंकार सबकुछ जानने की कोशिश करता है लेकिन कभी अपने बारे में बात नहीं करता है कि वह कौन है और कहाँ से आया है। वह अपनी मौत से बहुत डरता है। न तो उसे जीवन का पता है और नहीं मौत का पता है। समर्थ रामदास ने अपने शिष्य शिवाजी को उपदेश दिया था कि “जहाँ जीवन है, वहाँ मृत्यु नहीं है; और जहाँ मृत्यु है, वहाँ जीवन नहीं है।”
अगर हम ईमानदारी से विश्लेषण करें, तो शरीर पर हमारा अधिकार ‘नाममात्र’ का है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं: आप एक घर के मालिक हो सकते हैं, लेकिन अगर उस घर की दीवारें खुद-ब-खुद रंग बदलने लगें या उसकी छत आपकी मर्जी के बिना ढहने लगे, तो क्या आप वाकई उसके मालिक हैं?
शरीर के साथ हमारा रिश्ता कुछ ऐसा ही है:
1. जैविक स्वायत्तता (Biological Autonomy)
शरीर का 99% काम आपकी अनुमति के बिना होता है।
- अनियंत्रित कार्य: आपका पाचन तंत्र, फेफड़े, खून का बहाव और नई कोशिकाओं का बनना—इनमें से किसी पर भी आपका ‘कमांड’ नहीं है।
- नींद और उम्र: आप कितनी भी कोशिश कर लें, आप उम्र बढ़ने (Aging) को रोक नहीं सकते और न ही नींद जैसी बुनियादी जैविक ज़रूरत को हमेशा के लिए टाल सकते हैं।
2. इच्छा बनाम क्षमता (Will vs. Ability)
हमारा अधिकार केवल ‘संचालन’ (Operation) तक सीमित है, ‘निर्माण’ या ‘मरम्मत’ पर नहीं।
- आप हाथ उठा सकते हैं (संचालन), लेकिन हाथ की हड्डी कैसे जुड़ती है, उस प्रक्रिया पर आपका कोई अधिकार नहीं है।
- आप ज़हर खा सकते हैं (गलत अधिकार), लेकिन शरीर उस ज़हर के प्रति क्या प्रतिक्रिया देगा, उसे आप नियंत्रित नहीं कर सकते।
3. ‘लीज’ पर मिला हुआ यंत्र
दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो शरीर हमें प्रकृति से ‘लीज’ पर मिला है:
अधिकार की सीमा: हमारा अधिकार केवल इतना है कि हम इसे अच्छी खुराक दें, व्यायाम करें और इसका सदुपयोग करें। जैसे ही इसके ‘सॉफ्टवेयर’ (प्राण या चेतना) और ‘हार्डवेयर’ का तालमेल बिगड़ता है, हमारा सारा दावा खत्म हो जाता है।
किराएदार जैसा व्यवहार: हम इसके साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं, इसे सजा सकते हैं, लेकिन अंततः यह प्रकृति के नियमों (Entropy) के अधीन है।