जिसे हम मैं कहते हैं, उस पर हमारा बस नहीं चलता; और जो वास्तव में हमारा है, उसे हम जानते नहीं। बाजार से अगर हम कोई सामान लाते हैं तो उस पर हमारा पूरा अधिकार होता है उसे हम कुछ भी कर सकते हैं लेकिन यह जो हमारा शरीर है इस पर बहुत ही सिमित अधिकार है। फिर भी हम अपने को कुछ विशेष मानते हैं। आईये विस्तृत जानकारी समझते हैं :
यदि हम गहराई से विश्लेषण करें—वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से—तो हमें पता चलेगा कि मनुष्य का अपने शरीर पर अधिकार बहुत ही सीमित है।
इसे हम तीन स्तरों पर देख सकते हैं:
1. जैविक स्तर (Biological Level): केवल 1% से 5% अधिकार
हमारे शरीर की अधिकांश महत्वपूर्ण क्रियाएँ हमारे नियंत्रण (Will Power) से बाहर हैं।
- अनैच्छिक क्रियाएँ (Involuntary): आपके दिल का धड़कना, भोजन का पचना, किडनी का खून साफ करना, घाव का भरना और कोशिकाओं (Cells) का मरना-बनना—इन पर आपका 0% अधिकार है।
- ऐच्छिक क्रियाएँ (Voluntary): आप केवल अपने हाथ-पैर हिला सकते हैं, बोल सकते हैं या पलकें झपका सकते हैं। यह कुल शारीरिक क्रियाओं का बहुत छोटा हिस्सा है।
2. निर्माण और अंत (Design and End): 0% अधिकार
- जन्म: आपने यह तय नहीं किया कि आपका जन्म कहाँ होगा, आपका DNA कैसा होगा, या आपकी आँखों का रंग क्या होगा।
- बुढ़ापा और मृत्यु: आप चाहे अरबों रुपये खर्च कर दें, आप शरीर को बूढ़ा होने से या उसकी मृत्यु को आने से रोक नहीं सकते। प्रकृति के इस कानून पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं है।
3. योग और मन का स्तर (Yogic Level): 10% से 20% तक विस्तार
साधारण इंसान का अधिकार बहुत कम होता है, लेकिन एक योगी अभ्यास (ऊर्ध्वगमन) के माध्यम से इस अधिकार को बढ़ा सकता है।
- प्राणायाम: श्वास एक ऐसी क्रिया है जो ऐच्छिक भी है और अनैच्छिक भी। श्वास पर नियंत्रण पाकर योगी अपने स्नायु तंत्र (Nervous System) और दिल की धड़कन तक को प्रभावित कर सकता है।
- हठयोग: हठयोगी अपने शरीर की भीतरी गर्मी और बीमारियों पर एक हद तक नियंत्रण पा लेते हैं। लेकिन फिर भी, अंत में शरीर प्रकृति के नियमों के ही अधीन रहता है।
अधिकार कम होने का कारण क्या है?
प्रकृति (Nature) ने शरीर का नियंत्रण अपने हाथ में रखा है ताकि हमारा ‘अहंकार’ इसे तुरंत नष्ट न कर दे। सोचिए, अगर दिल धड़काने का अधिकार हमारे हाथ में होता और हम सो जाते या भूल जाते, तो हमारा क्या होता?
वास्तविकता क्या है?
सच तो यह है कि शरीर “आपका” नहीं है, बल्कि आपको “किराए” पर मिला हुआ एक वाहन है।
- आप इसके मालिक नहीं, केवल इसके उपयोगकर्ता (User) हैं।
- हमारा असली अधिकार केवल ‘निर्णय’ लेने पर है—कि हम इस शरीर रूपी वाहन को किस दिशा में ले जाते हैं (भोग की ओर या योग की ओर)।
निष्कर्ष
मनुष्य का शरीर पर अधिकार ‘भ्रम’ (Illusion) अधिक है और ‘यथार्थ’ (Reality) कम। हम शरीर को ‘मैनेज’ (Manage) कर सकते हैं, लेकिन उसे ‘कमांड’ (Command) नहीं कर सकते।
एक विचार: जिसे हम अपना कहते हैं, उस पर हमारा बस नहीं चलता; और जो वास्तव में हमारा है (आत्मा), उसे हम जानते नहीं।
क्या इस बात को जानकर आपको थोड़ा आश्चर्य या बेचैनी महसूस होती है कि जिस शरीर के लिए हम सब कुछ करते हैं, उस पर हमारा नियंत्रण इतना कम है?