Skip to content

ज्ञान-विज्ञान

Menu
  • Home
  • Important helpline No.
  • Statewise Service
    • Uttar Pradesh
    • Maharashtra
    • Bihar
    • Punjab
    • Delhi
    • Haryana
    • Kolkata
  • Goverment Service
    • Get Fund
    • Pincode
    • IFSC Code
  • Professional
  • Stock Market
  • Health Service
    • Diabetes-Doctor
    • Neurologist
    • Cardiologist
    • Cancer Specialist
    • Psychiatrists
  • Health
  • Dharma
  • Gyan-Vigyan
  • Make Money
  • USA
  • News
  • About
  • Contact
  • Privacy Policy
Menu
sansar ka dukh

संसार में इतना दुख है फिर भी विवेक और वैराग्य क्यों नहीं जगता 

Posted on February 3, 2026

संसार में सब कुछ मिलने के बाद भी इतना तनाव, दुख, पीड़ा मिल रहा है फिर भी इंसान उसी में डूबते चला जा रहा है। thought यह एक बहुत ही गहरा विरोधाभास है। संसार में दुख को देखकर तुरंत वैराग्य (Detachment) पैदा होना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। इसके पीछे कुछ बहुत ही सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण हैं:

1. ‘आशा’ का जाल (The Trap of Hope)

इंसान दुख में भी एक झूठी आशा पाले रहता है। उसे लगता है कि “आज बुरा वक्त है, कल सब ठीक हो जाएगा।” वह दुख के मूल कारण को काटने के बजाय, सुख के आने का इंतज़ार करता है। बुद्ध कहते थे कि संसार ‘दुख’ है, लेकिन इंसान सोचता है कि “संसार में दुख है, लेकिन मैं इसे अपने लिए सुखद बना लूँगा।” यही ‘आशा’ विवेक को दबा देती है।

2. सुख की अल्पकालिक स्मृति (Short Memory of Pleasure)

हम दुख को बहुत जल्दी भूल जाते हैं और सुख की याद को पकड़ कर रखते हैं। जैसे ही दुख का एक क्षण बीतता है, इंद्रियां फिर से पुराने भोगों की ओर भागने लगती हैं। इसे योग में ‘संस्कार’ कहते हैं। पुराने सुखों के गहरे निशान मन पर इतने प्रभावी होते हैं कि वे वर्तमान के दुख को भी नजरअंदाज करवा देते हैं।

3. ‘मोह’ और ‘ममता’ (Attachment)

दुख होने पर भी हम उन चीजों या लोगों को नहीं छोड़ना चाहते जो दुख दे रहे हैं। हमें दुख से ज्यादा ‘बदलाव’ से डर लगता है। वैराग्य का अर्थ है—पुरानी आदतों और मोह का त्याग। इंसान को ज्ञात दुख (Known Suffering) में जीना मंजूर है, लेकिन अज्ञात स्वतंत्रता (Unknown Freedom) की ओर कदम बढ़ाना डरावना लगता है।

4. विवेक का ‘सुप्त’ होना

विवेक (Discrimination) एक धारदार तलवार की तरह है, जिसे अभ्यास से तेज करना पड़ता है।

  • संसार के शोर, मनोरंजन और मोबाइल की दुनिया ने हमारी सोचने-समझने की शक्ति को सुस्त (Dull) कर दिया है।
  • जब बुद्धि ही सुस्त हो, तो वह दुख के पीछे छिपे सत्य को नहीं देख पाती। वह केवल सतही तौर पर रोती है, लेकिन गहराई में जाकर वैराग्य पैदा नहीं करती।

वैराग्य कैसे जगता है?

वैराग्य का अर्थ संसार छोड़कर भागना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि “यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।”

वैराग्य जगाने के दो तरीके हैं:

  1. दुख के बोध से (शमशान वैराग्य): जो अक्सर अस्थायी होता है। किसी की मृत्यु देखकर जो वैराग्य आता है, वह घर पहुँचते ही खत्म हो जाता है।
  2. विवेक से (ज्ञान वैराग्य): यह स्थायी है। इसमें व्यक्ति यह समझ जाता है कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब आप सिक्के को ही छोड़ देते हैं, तब वैराग्य जगता है।

एक सत्य:

इंसान दुख से बचना तो चाहता है, लेकिन ‘दुख के कारण’ (कामना और मोह) को छोड़ना नहीं चाहता। जिस दिन उसे यह समझ आ जाता है कि “दुख बाहर से नहीं, मेरी अपनी पकड़ (Attachment) से आ रहा है”, उसी दिन वैराग्य का उदय होता है।

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • टेलीपैथी क्या है और यह कैसे काम करती है ? संकल्प शक्ति का रहस्य
  • घर बैठे एक्स्ट्रा अर्निंग के 19 बेहतरीन तरीके
  • जो नहीं दीखता उसी से सब होता है
  • गट बैक्टीरिया क्या हैं ?
  • प्राण शक्ति क्या है और वह कैसे काम करता है ?

Recent Comments

  1. Vijay on पढ़ो, कमाओ, शादी करो, बच्चे पालो और मर जाओ क्या यही जीवन है ?
  2. Sheth Ramesh on बुढ़ापे का कारण है टेलोमेरेस एंजाइम
  3. Sheth Ramesh on बुढ़ापे का कारण है टेलोमेरेस एंजाइम
  4. Vijay on संसार दुखालय क्यों है ?

Archives

  • February 2026
  • January 2026
  • December 2025

Categories

  • Bihar
  • Cancer Specialist
  • Cardiologist
  • Delhi
  • Dharma
  • Diabetes Doctor
  • Get Fund
  • Government Service
  • Gyan-Vigyan
  • Haryana
  • Health
  • IFSC Code
  • Important Helpline No.
  • Kolkata
  • Maharashtra
  • Make Money
  • Neurologist
  • News
  • Pincode
  • Professional
  • Psychiatrists
  • Punjab
  • Stock Market
  • USA
  • Uttar Pradesh
©2026 ज्ञान-विज्ञान | Design: Newspaperly WordPress Theme