संसार और कष्ट (दुख) के संबंध में यह प्रश्नोत्तरी अत्यंत गहरी और दार्शनिक है। इसका हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है:
प्रश्न: दुख का कारण क्या है?
उत्तर: मनुष्य को लगता है कि वह अपनी कड़ी मेहनत से परिस्थितियों को बदल सकता है। उसे अपनी शक्ति पर अहंकार होता है। वह सोचता है, “अगर मैं थोड़ा और पैसा, थोड़ा और सम्मान कमा लूँ, तो मेरा दुख दूर हो जाएगा।” वह यह समझने में विफल रहता है कि समस्या बाहर नहीं, बल्कि संसार की प्रकृति के भीतर ही निहित है।
प्रश्न: कुछ लोगों को दुख महसूस क्यों नहीं होता?
उत्तर: जिन्हें दुख महसूस नहीं होता, वे जागृत नहीं हैं, बल्कि मानसिक बेहोशी की स्थिति में हैं। वे खाने, पीने, सोने और शारीरिक सुखों में इतने मग्न हैं कि उनकी चेतना स्थूल (Gross) हो गई है। उन्हें तब तक दुख महसूस नहीं होता जब तक उनके शरीर या आराम को गंभीर नुकसान न पहुँचे। जिस प्रकार एक जानवर को यह एहसास नहीं होता कि वह कसाईखाने जा रहा है और रास्ते में घास चरता रहता है, उसी प्रकार कई मनुष्य जीवन की नश्वरता को नहीं देख पाते। इसे “सुख” नहीं, बल्कि “संवेदनहीनता” कहना अधिक सटीक होगा।
प्रश्न: मनुष्य दुख से बचना क्यों नहीं चाहता?
उत्तर: मनुष्य दुख का अनुभव तो करता है, लेकिन बीच-बीच में उसे सुख की छोटी-छोटी झलकियाँ भी मिलती हैं। वह इन झलकियों को पकड़ लेता है और सोचता है, “पिछली बार मैंने दुख सहा था, लेकिन इस बार शायद मुझे स्थायी सुख मिल जाएगा।”
प्रश्न: इतना दुख सहने के बाद भी मनुष्य संसार से विरक्त (Detached) क्यों नहीं होता?
उत्तर: दुख एक आदत बन जाता है। हम जिस तरह से जीते हैं, वह चाहे कितना भी कष्टदायक क्यों न हो, परिचित (Comfort Zone) लगता है। संसार से विरक्ति या वैराग्य एक अनजाना रास्ता है, और मनुष्य अनजाने से डरता है। उसे लगता है कि “जो कुछ भी है, जैसा भी है, कम से कम हमारा तो है।”
प्रश्न: संसार के दुखों से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर: गौतम बुद्ध ने कहा था कि दुख का कारण अज्ञानता है। जब व्यक्ति संसार की “क्षणिकता” (Impermanence) को समझ लेता है, तो उसके भीतर वैराग्य पैदा होता है। उसे एहसास होता है, “यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।” “बाहर की कोई भी चीज़ मुझे पूर्ण सुख नहीं दे सकती।” तब वह ज्ञान का मार्ग अपनाता है और पूर्णतः सुखी हो जाता है।
प्रश्न: हमें संसार की क्षणिकता का एहसास कब होता है?
उत्तर: जब हम श्मशान में किसी की मृत्यु देखते हैं, तो हमें एक क्षण के लिए वैराग्य का अनुभव होता है (जिसे “श्मशान वैराग्य” कहा जाता है)। लेकिन जैसे ही हम बाहर निकलते हैं, प्रकृति की “माया” हमें यह भुला देती है कि हमारी अपनी मृत्यु भी निश्चित है। हम ऐसे जीते हैं जैसे हम यहाँ हमेशा रहेंगे।
प्रश्न: इतना दुख सहने के बाद भी मनुष्य उसी दलदल में क्यों फँसा रहता है?
उत्तर: माया इतनी शक्तिशाली है कि वह सत्य को ओझल कर देती है। जैसे ही हम दुख से बाहर निकलते हैं, प्रकृति हमें किसी नए प्रलोभन या सुख की आशा में उलझा देती है। उदाहरण: जिस तरह एक मछली जाल में फँसने के बाद भी भोजन के अगले टुकड़े की ओर दौड़ती है, उसी तरह मनुष्य एक दुख से उबरते ही अगले सुख की तलाश शुरू कर देता है।